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14 साल में मुकेश अंबानी करीब 8 गुना बढ़े, अनिल अंबानी की कंपनियों की वैल्यू 50% घटी



Mukesh Ambani vs Anil Ambani

    • जब धीरूभाई थे, तब रिलायंस 28 हजार करोड़ का था, 19 साल बाद आज अनिल अंबानी समूह उससे भी पीछे
    • अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली कंपनियों की वैल्यू 26 हजार करोड़ रुपए

नई दिल्ली. अनिल अंबानी ने एरिक्सन के 550 करोड़ में से 458 करोड़ रुपए चुका दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर वे बकाया रकम नहीं चुकाते हैं तो उन्हें तीन महीने के लिए जेल जाना होगा। माना जा रहा है कि अनिल अंबानी की भाई मुकेश अंबानी ने मदद की है। अनिल ने मुश्किल वक्त में साथ देने के लिए मुकेश और नीता अंबानी का शुक्रिया भी अदा किया है। एरिक्सन के अलावा अनिल अंबानी समूह पर कई कंपनियों के 48 हजार करोड़ रुपए बकाया हैं। उनके स्वामित्व वाली कंपनियों की कुल मार्केट वैल्यू 26,251 करोड़ रुपए है, जबकि 2002 में जब रिलायंस के संस्थापक धीरूभाई अंबानी का निधन हुआ था, तब अविभाजित रिलायंस समूह का मार्केट कैप 28,500 करोड़ रुपए का था। 2005 में दोनों भाई अलग हुए थे। मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज का मार्केट कैप अभी 8.54 लाख करोड़ रुपए है।

2005 में दोनों भाइयों में बंटवारा हुआ

मुकेश अंबानी 1981 और अनिल अंबानी 1983 में रिलायंस से जुड़े थे। जुलाई 2002 में धीरूभाई अंबानी के निधन के बाद मुकेश ग्रुप के चेयरमैन बने। वहीं, अनिल मैनेजिंग डायरेक्टर बने। 2005 में दोनों के बीच बंटवारा हुआ। मुकेश अंबानी के हिस्से में पेट्रोकेमिकल के मुख्य कारोबार रिलायंस इंडस्ट्रीज, इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कॉर्प लिमिटेड, रिलायंस पेट्रोलियम, रिलायंस इंडस्ट्रियल इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड जैसी कंपनियां आईं। छोटे भाई ने अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप बनाया। इसमें आरकॉम, रिलायंस कैपिटल, रिलायंस एनर्जी, रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेस जैसी कंपनियां प्रमुख थीं।

चार साल तक दोनों भाइयों की नेटवर्थ में ज्यादा फर्क नहीं था

रिलायंस ग्रुप का बंटवारा होने से पहले 2004 में मुकेश और अनिल अंबानी की ज्वाइंट वैल्थ 6.4 अरब डॉलर थी। इसके बाद दोनों की नेटवर्थ के बीच फर्क बढ़ता गया।

 

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अनिल अंबानी पावर और इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स को नहीं चला पाए

अनिल अंबानी 14.8 अरब डॉलर की नेटवर्थ के साथ 2006 में देश के तीसरे सबसे अमीर व्यक्ति थे। मनमोहन शेट्टी से 350 करोड़ रुपए में एडलैब्स खरीदने के बाद अनिल अंबानी समूह की 2008 में भारत में 700 स्क्रीन्स हो गईं। एडलैब्स देश की सबसे बड़ी मल्टीप्लेक्स चेन बन चुकी थी। मार्च 2008 में अनिल अंबानी ग्रुप की टोटल वर्थ 2.36 लाख करोड़ रुपए हो गई थी।

अनिल अंबानी ने पावर और इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में जमकर निवेश किया। इसके लिए उन्होंने सरकारी बैंकों से कर्ज उठाया। लेकिन इस कारोबार में वे मुनाफा नहीं कमा पाए। 2009 में कंपनी का वैल्यूएशन घटकर 80 हजार करोड़ रुपए हो गया। मार्च 2010 में कंपनी ने दोबारा एक लाख करोड़ रुपए के मार्केट कैप का आंकड़ा पार किया, लेकिन 2011 में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में अनिल अंबानी का नाम उछलने के बाद साल दर साल उनकी कंपनियों का मार्केट कैप घटता रहा।

रिलायंस समूह में विभाजन से पहले आरकॉम रिलायंस इन्फोकॉम थी। 2002 में इस कंपनी ने सीडीएमए टेक्नोलॉजी चुनी। सीडीएमए उस वक्त सफल थी, लेकिन इसका इस्तेमाल सिर्फ 2जी और 3जी में हो सका। जब भारत में 2जी खत्म होने लगा और 3जी जीएसएम स्मार्टफोन्स बढ़ने के साथ 4जी की दस्तक आई तो आरकॉम की सीडीएमए सेवाएं पिछड़ने लगीं।

इस दौरान सिर्फ एक साल यानी 2014 में अनिल अंबानी समूह का वैल्यूएशन बढ़कर 66 हजार कराेड़ रुपए हुआ लेकिन तब से अब तक यह वैल्यूएशन आधे से भी ज्यादा घट चुका है।

ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के अनुसार अनिल अंबानी ग्रुप की कंपनियों पर एक समय एक लाख करोड़ से ज्यादा का कर्ज था। उनका समूह सालाना 10,000 करोड़ का ब्याज चुका रहा था।

राफेल डील की वजह से विवादों में

अनिल अंबानी समूह ने 2015 में डिफेंस सेक्टर में कदम रखा। लेकिन राफेल डील के तहत रिलायंस डिफेंस को ऑफसेट डील मिलने को कांग्रेस ने मुद्दा बना लिया और अंबानी विवादों में आ गए।

मुकेश अंबानी के लिए टर्निंग प्वॉइंट

2005 में कच्चे तेल की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल के रिकॉर्ड स्तर पर थी। मुकेश के लिए यह सबसे बड़ी चिंता थी। क्योंकि उनकी रिफाइनरी कंपनियों की मार्जिन घटने का डर था। उस दौरान देश में मोबाइल फोन मार्केट तेजी से आगे बढ़ रहा था। लेकिन दोनों भाइयों के बीच हुए करार के मुताबिक मुकेश अंबानी ऐसा कोई बिजनेस नहीं शुरू कर सकते थे जिससे अनिल को नुकसान हो। 2010 में दोनों के बीच नॉन-कंपीट कंडीशन खत्म हो गई। तब मुकेश अंबानी ने तत्काल मोबाइल मार्केट में उतरने का निर्णय लिया।

 

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