जालन्धर : 28 साल पहले रोजगार दफ्तर में नौकरी की जलाई थी अलख, आजतक हाथ खाली

  • डब्ल एमए युवा टैक्सी चला कर रहा गुजारा, न मिली नौकरी, न मिला सरकारी भत्ता
  • पंजाब में 28 सालों दौरान 15 साल अकाली भाजपा तथा 13 साल कांग्रेस पार्टी की रही सरकार

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अनिल वर्मा
पंजाब सूबे में रोजगार तलाश रहे युवाओं को राजनीतिक पार्टियां हर बार चुनावों दौरान कई बड़े बड़े सपने दिखाती हैं मगर सत्ता में आने के बाद सभी सपने सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट काट कर टूट जाते हैं। यह कहानी जालन्धर के उस युवा की है जिसने अपनी पढ़ाई दौरान ही नौकरी तलाशने के लिए 28 साल पहले जालन्धर के रोजगार दफ्तर में आवेदन भरा था मगर 28 साल बीत जाने के बाद आज तक न तो नौकरी मिली और न ही सरकारी भत्ता। हालांकि पिछले 28 सालों से पलविंदर सिंह अपने आवेदन नंबर 8859/92 को हर साल रिन्यू करवाने तथा नौकरी की आस लिए जालन्धर स्थित रोजगार दफ्तर Employment exchange Jalandhar अपनी हाजिरी लगाने पहुंच जाता है।

पलविंदर सिंह ने बताया कि उसकी उम्र 40 साल है तथा वह पोलिकल साईंस में डबल एमए, आईटीआई से कारपेंटर का डिप्लोमा होल्डर है। उसके पिता अमृतसर में गज्टर्ड आफिसर थे 2005 में उनका देहांत हो गया। परिवार में 2 बहने एक शादीशुदा तथा दूसरी कुंवारी है। इसके अलावा पलविंदर भी शादीशुदा है तथा उसके दो बच्चे हैं। परिवार का पेट पालने के लिए कड़ी मेहनत की अब प्राईवेट टैक्सी ड्राईवर के तौर पर काम कर रहा है।

बता दें कि सन् 1992 में पंजाब मेंं कांग्रेस पार्टी की सरकार थी और स. बेअंत सिंह मुख्यमंत्री थे। उसके बाद 1995-96 दौरान हरचरण सिंह बराड़,1996-97 राजिंदर कौर भठ्ल, 1997 से 2002 तक स. प्रकाश सिंह बादल, 2002 से 2007 तक कैप्टन अमरेन्द्र सिंह, 2007 से 2017 तक प्रकाश सिंह बादल तथा 2017 से अब तक कैप्टन अमरेन्दर सिंह मुख्यमंत्री हैं। इन 28 सालों दौरान पंजाब की सत्ता पर 15 साल अकाली भाजपा तथा करीब 14 साल कांग्रेस की सरकार रही मगर इस दौरान रोजगार दफ्तर में अपना भविष्य तलाश रहे पढ़े लिखे युवाओं की ओर किसी भी सरकार ने तव्जोह नहीं दी। यही कारण है कि पलविंदर सिंह जैसे हजारों पढ़े लिखे होनहार युवा कोई सिफारिश न होने के बेरोजगारी की दलदल मेंं डूबते ही जा रहे हैं।

 

 

यही कारण है कि सूबे में नौकरी न मिलने के चलते युवा अब विदेशों में अपना भविष्य तलाश करने के लिए अपनी जमीनों को बेच बेच कर पंजाब से रुख्सत हो रहे हैं। अगर सरकारों ने इस गंभीर मसले पर अभी भी चिंतन ने किया और युवाओं का हाथ नहीं थामा तो आने वाले समय में शायद पंजाब कृषी प्रधान सूबा कहलाने के भी लायक नहीं रहेगा।